Monday, August 6, 2018

Meaning of Guidance (मार्गदर्शन का अर्थ)

Meaning of Guidance  (मार्गदर्शन का अर्थ)

लग-अलग लोगों, प्रशासकों, राजनेताओं, दार्शनिकों, नेताओं और शिक्षाविदों द्वारा अलग-अलग समय में मार्गदर्शन को परिभाषित और समझ लिया गया है जिसके लिए मार्गदर्शन के दो प्रकार के अर्थ हैं- एक पुराना या पारंपरिक अर्थ है और दूसरा आधुनिक अर्थ है। अन्य सामग्रियों और विषयों की तरह, मार्गदर्शन का आधुनिक अर्थ चित्र में आया जब जोर दिया गया और आर्थिक समस्याओं, नियुक्ति या रोजगार और व्यावसायिक रुझानों पर अधिक ध्यान दिया गया।

उसके बाद नियोक्ता को अपने काम में प्रभावी बनाने के लिए अधिक से अधिक सहायता प्रदान करने की एक महसूस की आवश्यकता बन गई। यह प्रवृत्ति अब मानवता, कला, विज्ञान, वाणिज्य और पेशेवर क्षेत्रों के सभी विषयों को शामिल करने के तेज़ी से चल रही है। इसलिए अवधारणा का आधुनिक अर्थ "मार्गदर्शन" स्वयं को किसी भी विषय में

सीमित नहीं करता है। इसलिए यह समाजशास्त्र, अर्थशास्त्र और शिक्षा से प्रभावित है।

definitions  of guidance (मार्गदर्शन की परिभाषाएं)

"मार्गदर्शन प्रत्येक व्यक्ति को उनकी क्षमताओं को समझने और उन्हें यथासंभव विकसित करने और उन्हें जीवन लक्ष्यों से जोड़ने और अंततः सामाजिक और वांछित आत्म-मार्गदर्शन की स्थिति तक पहुंचने के लिए सक्षम करने की प्रक्रिया है। ऑर्डर। "-ट्रैकलर

"मार्गदर्शन एक व्यक्ति को वास्तविकता के खिलाफ इस अवधारणा का परीक्षण करने और खुद को संतुष्टि के साथ वास्तविकता में परिवर्तित करने और लाभ के लिए इसे बदलने के लिए, काम की दुनिया में अपनी और उसकी भूमिका की एक एकीकृत और पर्याप्त तस्वीर को विकसित करने और स्वीकार करने की प्रक्रिया है। समाज"। - राष्ट्रीय व्यावसायिक मार्गदर्शन संघ (यूएसए)

Labels: , , , ,

Sunday, August 5, 2018

मत मारो तुम कोख में इसको

मत मारो तुम कोख में इसको

क इलाके में एक भले आदमी का देहांत हो गया लोग अर्थी ले जाने को तैयार हुये और जब उठाकर श्मशान ले जाने लगे तो एक आदमी आगे आया और अर्थी का एक पाऊं पकड़  लिया। और बोला के मरने वाले से मेरे 15 लाख लेने है, पहले मुझे पैसे दो फिर उसको जाने दूंगा।
     अब तमाम लोग खड़े तमाशा देख रहे है, बेटों ने कहा के मरने वाले ने हमें तो कोई ऐसी बात नही की के वह कर्जदार है, इसलिए हम नही दे सकतें मृतक के भाइयों ने कहा के जब बेटे जिम्मेदार नही तो हम क्यों दें।
        अब सारे खड़े है और उसने अर्थी पकड़ी हुई है, जब काफ़ी देर गुज़र गई तो बात घर की औरतों तक भी पहुंच गई। मरने वाले कि एकलौती बेटी ने जब बात सुनी तो फौरन अपना सारा ज़ेवर उतारा और अपनी सारी नक़द रकम जमा करके उस आदमी के लिए भिजवा दी और कहा के भगवान के लिए ये रकम और ज़ेवर बेच के उसकी रकम रखो और मेरे पिताजी की अंतिम यात्रा को ना रोको।
            मैं मरने से पहले सारा कर्ज़ अदा कर दूंगी। और बाकी रकम का जल्दी बंदोबस्त कर दूंगी। अब वह अर्थी पकड़ने वाला शख्स खड़ा हुआ और सारे लोगो से मुखातिब हो कर बोला: असल बात ये है मरने वाले से 15 लाख लेना नही बल्के उनके देना है और उनके किसी वारिस को में जानता नही था तो मैने ये खेल खेला , अब मुझे पता चल चुका है के उसकी वारिस एक बेटी है और उसका कोई बेटा या भाई नही है।

👌🏻👌🏻मत मारो तुम कोख में इसको
इसे सुंदर जग में आने दो,
छोड़ो तुम अपनी #सोच ये छोटी

इक माँ को #ख़ुशी मनाने दो,
बेटी के आने पर अब तुम
घी के दिये जलाओ,
आज ये #संदेशा पूरे जग में फैलाओ
*बेटी बचाओ बेटी पढ़ाओ।*

।।।अच्छा लगे तो शेयर करे।।।

Labels: , , , ,

Saturday, August 4, 2018

प्रेरक कथा: देने वाला कौन ?

प्रेरक कथा: देने वाला कौन ?


ज हमने भंडारे में भोजन करवाया, आज हमने ये बांटा, आज हमने वो दान किया... हम अक्सर ऐसा कहते और मानते हैं इसी से सम्बंधित एक अविस्मरणीय कथा सुनिए...

एक लकड़हारा रात-दिन लकड़ियां काटता, मगर कठोर परिश्रम के बावजूद उसे आधा पेट भोजन ही मिल पाता था। एक दिन उसकी मुलाकात एक साधु से हुई। लकड़हारे ने साधु से कहा कि जब भी आपकी प्रभु से मुलाकात हो जाए, मेरी एक फरियाद उनके सामने रखना और मेरे कष्ट का कारण पूछना।
कुछ दिनों बाद उसे वह साधु फिर मिला। लकड़हारे ने उसे अपनी फरियाद की याद दिलाई तो साधु ने कहा कि- प्रभु ने बताया हैं कि लकड़हारे की आयु 60 वर्ष हैं और उसके भाग्य में पूरे जीवन के लिए सिर्फ पाँच बोरी अनाज हैं, इसलिए प्रभु उसे थोड़ा अनाज ही देते हैं ताकि वह 60 वर्ष तक जीवित रह सके।
समय बीता। साधु उस लकड़हारे को फिर मिला तो लकड़हारे ने कहा---ऋषिवर...!! अब जब भी आपकी प्रभु से बात हो तो मेरी यह फरियाद उन तक पहुँचा देना कि वह मेरे जीवन का सारा अनाज एक साथ दे दें, ताकि कम से कम एक दिन तो मैं भरपेट भोजन कर सकूं।
अगले दिन साधु ने कुछ ऐसा किया कि लकड़हारे के घर ढ़ेर सारा अनाज पहुँच गया। लकड़हारे ने समझा कि प्रभु ने उसकी फरियाद कबूल कर उसे उसका सारा हिस्सा भेज दिया हैं। उसने बिना कल की चिंता किए, सारे अनाज का भोजन बनाकर फकीरों और भूखों को खिला दिया और खुद भी भरपेट खाया। लेकिन अगली सुबह उठने पर उसने देखा कि उतना ही अनाज उसके घर फिर पहुंच गया हैं। उसने फिर गरीबों को खिला दिया। फिर उसका भंडार भर गया। यह सिलसिला रोज-रोज चल पड़ा और लकड़हारा लकड़ियां काटने की जगह गरीबों को खाना खिलाने में व्यस्त रहने लगा।
कुछ दिन बाद वह साधु फिर लकड़हारे को मिला तो लकड़हारे ने कहा---ऋषिवर ! आप तो कहते थे कि मेरे जीवन में सिर्फ पाँच बोरी अनाज हैं, लेकिन अब तो हर दिन मेरे घर पाँच बोरी अनाज आ जाता हैं।
साधु ने समझाया, तुमने अपने जीवन की परवाह ना करते हुए अपने हिस्से का अनाज गरीब व भूखों को खिला दिया, इसीलिए प्रभु अब उन गरीबों के हिस्से का अनाज तुम्हें दे रहे हैं।
कथासार- किसी को भी कुछ भी देने की शक्ति हम में है ही नहीं, हम देते वक्त ये सोचते हैं, की जिसको कुछ दिया तो ये मैंने दिया!
दान, वस्तु, ज्ञान, यहाँ तक की अपने बच्चों को भी कुछ देते दिलाते हैं तो कहते हैं मैंने दिलाया । वास्तविकता ये है कि वो उनका अपना है आप को सिर्फ परमात्मा ने निहित मात्र बनाया हैं उन तक उनकी जरूरतों तक पहुचाने के लिये तो निहित होने का घमंड कैसा ??

Labels: , , ,